About Us

मानव जीवन विकास समिति एक सामाजिक गैर-सरकारी संगठन है, जिसका गठन वर्ष 2000 में सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 के तहत जबलपुर सम्भाग मे रजिस्टर्ड है, समिति का कार्यक्षेत्र पूरा भारत है जो पिछले 20 वर्षो से लगातार अपनी गतिविधियां कार्यकर्ताओं की मदद से निरन्तर ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रही है। समिति मे 7 सदस्यीय प्रबंध समिति एवं 13 सदस्यीय साधारण सभा गठित है जो अपने दायित्यों का निर्वाहन करती है।

समिति अपने 27 एकड के क्षेत्र में आफिस, सह-प्रषिक्षण केन्द्र व नर्सरी की स्थापना कर जड़ीबूटी संग्रह व सम्वर्धन, वृक्षारोपण व जैविक खेती को बढ़ावा देते हुए किसानों को प्रषिक्षण देने का भी कार्य कर रही है। समिति का मानना है कि वंचितों और किसानों के जीवन को बेहतर बनाने में सषक्त भूमिका निभाएगी जिससे भूखमुक्त और भयमुक्त समाज की रचना का सपना साकार हो सके। आम आदमी को मुख्यधारा में जोडने के लिये संस्था ने अनवरत् प्रयास किया है।

पृष्ठभूमि

मानव जीवन विकास समिति, मध्यप्रदेश के उत्तरी पूर्वी की ओर जबलपुर सम्भाग मे जिला कटनी मे स्थित है जो ना तो बुन्देलखण्ड, ना बघेलखण्ड और ना ही महाकौशल क्षेत्र मे आता है बल्कि इसे अपना अलग स्थानीय क्षेत्र से जाना जाता है। विध्यांचल पर्वत की पहाड़ियों मे जिले के उमरियापान क्षेत्र के करौदी गांव मे स्थित देष का भौगोलिक केन्द्र बिन्दु (स्मारक) स्थित है जो दुनिया मे जाना जाता है। तथा अमरकंटक मे जड़ीबूटियों का उद्धम बहुतायत मे पाया जाता है। कटनी जिला चूना पत्थर के शहर के नाम से लोकप्रिय है। कटनी का स्लिमनाबाद गांव संगमरमर पत्थर के नाम से सुप्रसिद्ध है। वहीं कटनी से लगा हुआ सतना जिला का मैहर धाम शारदा मंदिर धार्मिक पर्यटक के नाम से प्रसिद्ध है। रूहेलखण्ड की परम्परा रही है कि रूहेल राजपुताना होने के कारण यहां पर सामंती व्यवस्था के साथ सामाजिक कुरीतियों मे प्रबल दावेदार के साथ विद्यमान है। इस जिले के प्रमुख भागों मे उमड़ार, सोन एवं महानदी का कगार आता है तथा टमस नदी का उदगम क्षेत्र एवं कैमोर पहाड़ियों से लगा हुआ विध्यांचल क्षेत्र का सिरा माना जाता है। सोन एवं महानदी मे बिल्डिंग (भवन) बनाने वाली रेत का बड़ा व्यापार होता है। जबकि इसी इलाके मे बाणसागर बांध बनाने से यहां की कृषि एवं वन सम्पदा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना साफ दिखाई देता है। यह क्षेत्र कैमोर की पहाड़ियां, बांधवगढ़ का सफेद शेर के नाम से मशहूर जंगल के बीचों बीच का इलाका माना जाता है जो रूहेलखण्ड के नाम से जाना जाता है। यहां पर कोल, गोड़ एवं भुमिया जनजाति बहुतायत मे पाये जाते है। जबकि कोल जनजाति का उद्धम क्षेत्र माना जाता है। सम्पूर्ण क्षेत्र मे लगभग 40 प्रतिषत कोल जनजाति का निवास होना अपने आप मे प्रभावित है। इन जनजातियों के अलावा सामान्य, अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग की बसाहट है। आदिवासी मे पठारी क्षेत्र होने के कारण खेती की हालत पुरानी परम्परा से हटकर आज के परिवेष मे रासायनिक खाद, कीटनाषक दवाओं का अत्यधिक रूप से उपयोग हो रहा है। इसी क्षेत्र मे वार्षिक औसत वर्षा 850 से 1200 मि.मी. के बीचों बीच होती है। सामाजिक दृष्टि से देखें तो बच्चों एवं महिलाओं की हालत बहुत दयनीय है आज भी पर्दाप्रथा, दहेजप्रथा, बालविवाह जैसी प्रचलन देखने को मिल ही जाती है, बच्चों मे बाल मजदूरी करना अभी भी रूकने का नाम ही नही लेता ऐसे मे समिति लगातार काम को अंजाम देने प्रयासरत है।

कार्यक्रमों की उम्मीदें:-

समिति जो भी छोटे-छोटे कार्यक्रम गांवों मे चला रही है उसमे निम्न उम्मीद लगाई है।

  • शिक्षा स्तर को बढ़ावा देना।
  • स्वावलम्बन प्रक्रिया मे बढ़ावा।
  • जल स्तर मे बढ़ावा एवं सुधार।
  • पर्यावरण एवं टिकाऊ स्वावलम्बन।
  • पंचायतीराज की समझ का विकास।
  • हिंसा मुक्त समाज का निर्माण करना।
  • नशामुक्ति के खिलाफ माहौल निर्माण।
  • आदिवासी क्षेत्रों मे जागरण का संकेत।
  • लोगों की स्थायी आजीविका खड़ी करना।
  • जल, जंगल और जमीन को सुरक्षित करना।
  • किसानों को जैविक खेती करने बढ़ावा देना।
  • शासकीय योजनाओं की जानकारी व क्रियान्वयन।
  • युवा शिविरों का आयोजन कर जागरूकता लाना।
  • पलायन को रोकना व स्वरोजगार की ओर मोड़ना।
  • बेरोजगार, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
  • महिलाओं मे सषक्तिकरण व क्षमतावर्द्धन का विकास।

रणनीति:-

इन तमाम तकनीक और रणनीति के उपयोग से समिति अपने उद्धेष्य की पूर्ति करने मे लगी है।

  • योजनाओं का विकेन्द्रीकरण मे मदद करना।
  • जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करना।
  • कार्यकर्ताओं द्वारा गांव गांव मे संगठन खड़ा करना।
  • बैठक व छोटे छोटे नुक्कड़ सभाऐं आयोजित करना।
  • शासकीय विभागों से तालमेल बैठाना व काम कराना।
  • स्कूलों मे वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करना।
  • पत्रकारवार्ता व प्रशासनिक अधिकारियों के साथ संवाद करना।
  • गांव गांव मे स्वसहायता समूहों का निर्माण करना एवं संचालन।
  • मूलभूत सुविधाओं पर बल देना जैसे पेयजल, बिजली, आवास, शिक्षा एवं छोटी छोटी बीमारियों से बचाव।
  • सामाजिक कुरीतियों को समझाने के लिए लोकगीत, नाटक प्रदर्शन आदि के माध्यमों से समझाना एक गांव से बढ़कर तीन-चार गांवों को मिलाकर बैठक गोष्ठी करना।
  • वन अधिकार अधिनियम के तहत लोगों को वन भूमि मे काबिजों का दावा फार्म भरवाकर उन्हे अधिकार पत्र व काबिज भूमि का पट्टे दिलाने मे मदद करना।
  • पंचायत जनप्रतिनिधियों का निरन्तर क्षमतावद्धि करते रहना ताकि जनप्रतिनिधि अपने अधिकार के साथ काम करा सके।