Our Activity

समिति की गतिविधिया:-

1. भूमि प्रबन्धन

संस्था के पास 27 एकड़ भूमि है जो चारों ओर फेसिंग तथा 1500 सागौन के पेड़ो से घिरी है। 27 एकड़ भूमि में निम्नानुसार व्यवस्था की गयी है:-

  • 10 एकड़ भूमि में जैविक कृषि की जाती है, जिसमें फसलों के अनुसार गेहूॅ, धान, कोदो, चना, जौ उगाया जाता है। सब्जियों में आलू, टमाटर, बैगन, बरबटी, लौकी, प्याज, हल्दी, शलजम, गाजर, मूली, खीरा, पपीता तथा अन्य मौसमी सब्जियां उगायी जाती हैं।
  • वर्मी कल्चर के लिए तीन पिट क्रमषः सिंगल पिट, डबल पिट तथा 4 पिट बनवाए गए हंै। ये पिट 12.2 तथा 2.5 फिट के अनुपात में है। 
  • नाडेप कम्पोस्ट के लिए 5,10,15 फिट के दो पिट बनवाए गये हैं। 
  • 2 चीकू, 15 जामुन, 20 सिल्वर ओक, 2 महुआ के पेड़ हंै।
  • 5 एकड़ भूमि में सन् 2000 में अध्यक्ष राजगोपाल पी0 व्ही0 के प्रोत्साहन पर जनसहयोग से श्रमदान कर एक एकड़ में तालाब बनाया गया तथा 150 बांस के पौधे लगवाए गए, जिनकी संख्या आज बढ़कर 10,000 हो गई है। इसके अतिरिक्त नीम, पलाष, पीपल, बेर, कनेर, सागौन तथा मोजियन के पौधे लगाए हं जो आज पूर्ण विकसित होकर लहलहा रहे हैं। 

2. जड़ी बूटी संग्रह एवं संवर्धन

  • 1 एकड़ भूमि को 2001 में औषधीय पौधौं के रोपण के लिए तैयार किया गया। जिसमें एलोवेरा, गुड़मार, बज्रकन्द, अड़ूसा, लेंडी पीपल, चित्रक, ब्राम्ही, सुदर्षन, चिरायता, गिलोय, लाजवंती, गुड़हल, रामकन्द, अर्जुन, चमेली, शंखपुष्पी,, वन हल्दी, केषव कन्द, सफेद-काली मूसली, लेमनग्रास, काली हल्दी, तुलसी, अंगूर, गुग्गल, कपास, नीबूं, बच, गटारन, पीला कनेर, करंज, धतूरा, मुलेठी, आॅक (मदार), बेल, अरण्डी, हर्रा, बहेरा, आंवला, भिलावा, धाय, नागबला, कालेष्वर, डंडी दूधी, षिकाकाई, रीठा, अतिबला, तथा 10 आम और 1000 खम्मार के पौधे लगाए गए।
  • एक एकड़ में संस्था का कार्यालय तथा आवासीय भवन है। भवन के आस-पास बगीचा है जिसमें गुलाब, गुड़हल, चमेली, मोंगरा, गेंदा, के फूलों के पौधे हैं। इनके अतिरिक्त 3 घुघची, 3 तेंदूं, 7 केवडा, 1 कटहल, 25 शीषम, 3 महोगनी, 10 मुनगा, 25 नीम, 1 चीकू, 23 मीठी नीम, 4 आम तथा 1 अष्वगंधा 2 अंजीर के पौधे भी हैं।
  • 2.5 एकड़ भूमि में सन् 2000 में आंवला के 1200 पौधे लगाए गए थे।
  • 1.5 एकड़ में 75 अमरूद, 20 नींबू, 10 आम, 20 शहतूत, 10 बहेरा तथा 5 हर्रा के पौधे लगाए गए थे। जो आज वृक्ष बनकर फल दे रहे हैं ।
  • 3 एकड़ भूमि में एक मीटिंग हाल तथा दो अतिथि भवन हैं। इनसे कुछ दूरी पर एक डेरी फार्म है जिसमें एक गाय और एक बछड़ा है। 15 फीट व्यास का एक बड़ा कुॅआ है। इमारती लकड़ी सेझा के 50, पलास के 25, बेल के 2 तथा चिरौजीं के 2 पेड़ हैं।
  • 3 एकड़ भूमि में 2009 में कटंगा बांस के 3150 पौधे लगाये गये। 
  • संस्था ने 2009 में संस्था की भूमि के साथ लगी 3 एकड़ भूमि खरीद कर करंज तथा रतनजोत के पौधे लगाये।

3. जल प्रबन्धन

  • चीलघाट जिला दमोह के कृषको को सिंचाई के लिए 2 मोटर पम्प दिलवाए गये।
  • सन्नई ब्लाॅक मैहर, जमुनिया ब्लाॅक बड़वारा में जल प्रबन्धन के लिए जन सहयोग से एक-एक कुॅआ खुदवाया गया।
  • 2008-09 में मदारी टोला जिला कटनी में किचन गार्डन की सिंचाई के लिए 6 लोगांे को सिंचाई ड्रिप दिये गये। 
  • कृषि भूमि के दोनों ओर अधिक पानी की उपलब्धता से मिट्टी का क्षरण अधिक होता है तथा उपजाऊ तत्व भी बह जाते है। इसकी रोकथाम के प्रबन्ध कछारी तथा अन्य गांव में किये गये। 
  • ऐसे गांव जहाँ पानी की उपलब्धता अधिक है और इससे कृषि भूमि का नुकसान हो रहा है वहां जल प्रबन्धन का गाॅवों में प्रषिक्षण षिविर आयोजित कर लोगों को पानी का समुचित प्रबन्धन करने के लिए प्रेरित किया गया।
  • ऊँचाई पर बसे होने के कारण पानी को ऊपर तक ले जाना भी कई गाॅवों की समस्या थी। ऐसे गांव में मोटर पम्प, पाईप तथा अन्य उपयोगी संसाधनों की व्यवस्था जन सहयोग से करवाई गयी।
  • कम पानी की उपलब्धता में कैसे खेती की जाये इसका प्रषिक्षण देकर खेती करवाई गई जिससे अधिकांष गांवों की समस्या हल हुई।
  • डिण्डौरी मण्डला बालाघाट जिले के 12 गांवों में मेडबंदी करवाकर स्थानीय बीज संग्रह व संवर्धन के लिए बीज बैंक तैयार किए गए जो गांव के समूहों के माध्यम से संचालित किये जा रहे हैं।

4. जैविक कृषि

जैविक कृषि के विकास के लिए क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित किये गए। परस्परावलम्बन तथा स्वावलम्बन के लिए तीन फसली खेती को बढावा दिया गया। सामूहिक खेती के लाभ से अवगत करवाकर लोगों को प्रोत्साहित किया गया। शासन की कृषि नीतियों तथा योजनाओं को समझाकर उनका लाभ दिलवाने का प्रयत्न किया गया। जैविक कृषि प्रषिक्षण के अन्तर्गत राजस्थान तथा मुम्बई के प्रषिक्षक श्री जोसेफ कीवी एवं बलराज भाई ने बुंदेलखण्ड और बघेलखण्ड के जिलों से आए 35 लोगों को कंटूर विधि, कम्पोस्ट खाद, कीटनाषक औषधि, सब्जी उत्पादन, सींग खाद, गौ मूत्र द्वारा कीटनाषक घोल बनाना तथा कटिगं बडिंग की विधियों को सूक्ष्मता से समझाया । 26-27 मार्च 2007 को बसुधा केंद्र बिछिया में 55 महिलाओं और 57 पुरुषों को तथा जैलवारा जिला मण्डला में 32 महिलाओं और 57 पुरुषों को कम लागत की खेती का प्रषिक्षण दिया गया। पिछले 10 वर्षों में 19 कृषि प्रषिक्षणों का आयोजन किया गया ।

5. कृषि प्रषिक्षण

समिति के केन्द्र में प्रत्येक वर्ष किसानों के साथ जैविक कृषि ,वर्मी कम्पोस्ट ,नर्सरी , वृक्षारोपण का प्रषिक्षण व प्रायोगिक प्रषिक्षण दिया गया । जो अगले पेज में प्रषिक्षण चार्ट के रुप में दर्षाया गया है। समिति ने अपने कार्यकर्ता साथियों को इस दिषा में समझ बनाने के लिए दो एक्सपोजर कार्यक्रम भी आयोजित किए गए जिसमें राजस्थान एवं उत्तरप्रदेष के कई क्षेत्रों का भ्रमण किया गया। संस्था ने जब कृषि कार्य शुरू किया तब भूमि समतल तथा उर्वरक नहीं थी। भूमि सुधार का प्रयास किया गया तथा भूमि की उर्वरकता बढ़ाने की कोषिष की गई। मेड़बंदी करवाई गई, कम्पोस्ट खाद, वर्मी कल्चर का उपयोग करते हुए जैविक कृषि की गई। वर्ष 2000 से 2003 तक ठेके में देकर खेती का कार्य किया जाता रहा परन्तु 2004 से संस्था ने स्वयं खेती करना प्रारम्भ किया।

6. आपदा प्रबन्धन

आपदा प्रबन्धन के अन्तर्गत प्राकृतिक रूप से आने वाली विपत्तियों जैसे – सूखा, बाढ़, महामारी, भूकम्प आदि के समय लोगों को सहायता देने का कार्य किया जाता है। इस प्रबन्धन का आरम्भ 2004 में किया गया। इस वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में बुन्देलखण्ड व बघेलखण्ड के क्षेत्र में भीषण बाढ़ आई जिसके कारण मानव जीवन तहस-नहस हो गया। संस्था के अध्यक्ष राजगोपाल जी के निर्देषानुसार नई दिल्ली की गूॅज नामक संस्था से सहयोग की अपील की गई। संस्था ने खुलकर सहयोग किया। कटनी, पन्ना, दमोह तथा अन्य जिलों के 18 से 20 हजार परिवारों को कपड़े, राषन तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएं उपलब्ध करवाई गयीं। पन्ना जिले के पवई तथा अमानगंज ब्लाक के 50 गाॅव, दमोह जिले के पटेरा, बांदकपुर ब्लाॅक के 65 गांवों के बाढ़ पीडि़तांे को राहत सामग्री उपलब्ध करवाई गई। इस कार्य से प्रभावित होकर संस्था ने आपदा प्रबन्धन के कार्य को अपने कार्यक्रमों में सम्मिलित कर लिया।

7. वस्त्र वितरण

  • काम के बदले कपड़ा, 
  • स्कूल टू स्कूल कार्यक्रम, 
  • विपत्ति आपदा प्रबन्धन,
  • महिलाओं के लिए विषेष नेपकीन किट उपलब्ध करवाना।


गूज के सहयोग से संस्था विभिन्न क्षेत्रों में राहत कार्य कर रही है। काम के बदले कपड़ा कार्यक्रम के अन्तर्गत आदिवासी प्रधान क्षेत्रों में सफाई अभियान चलवाकर बदले में लोगों को कपड़ा दिया जाता है। संस्था दान या निःषुल्क कोई वस्तु नहीं देती ताकि लोगों का आत्मसम्मान सुरक्षित रहे। इसी प्रकार अन्य कार्य भी करवाए जाते हैं तथा बदले में वस्त्र दिए जाते हंै। स्कूल टू स्कूल कार्यक्रम के अन्तर्गत मण्डला के रानीदुर्गावती स्कूल में 140 बच्चों, एकता ग्राम के 167 बच्चों तथा 4 अन्य स्कूलों के 680 बच्चों को विगत तीन वर्षों से ड्रेस मटेरियल वितरण किया जा रहा है। गत वर्ष स्कूल चले कार्यक्रम के अन्तर्गत झुग्गी बस्तियों में कार्यक्रम आयोजित कर 2130 बच्चों कों कपड़े खिलौने तथा पाठ्य पुस्तकंे वितरित की गई। प्राकृतिक आपदाओं के समय प्रषासन की सहायता के लिए क्षेत्र का सर्वे कर शासकीय कार्यालयों को सूची भिजवाने का कार्य भी संस्था द्वारा किया जाता है। गत वर्षों में बुन्देलखण्ड के क्षेत्रों में वर्षा का औसत कम होने के कारण सूखा पड़ गया जिसके कारण पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ एवं दमोह के 125 गाॅव अत्यधिक प्रभावित हुए। गरीब वंचितों को काम के बदले कपड़ा व आपदा के समय राहत पहुंचाने का कार्य देष के किसी भी क्षेत्र में करने के लिए संस्था सदैव तत्पर है।

8. स्कालरषिप

योजना के अन्तर्गत 2006 में संस्था नंे तय किया कि महात्मा गाॅधी के विचारों के अनुरूप भारत के किसी भी राज्य का कोई भी व्यक्ति यदि जनहित में देष के अन्तिम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए शांति और अहिंसा के मूल्य पर रचनात्मक कार्य करता है तो उसकी दैनिक आवष्यकताओं की पूर्ति के लिए अंतरिम राहत के रूप में स्काॅलरषिप दी जायंेगी। शशि फाउंडेषन स्वीट्जरलैण्ड के सहयोग से देष के विभिन्न राज्योें में रचनात्मक कार्य के लिए समर्पित स्त्री-पुरूषों को स्काॅलरषिप योजना का लाभ दिया जा रहा है। उनमें कुछ लोग षिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए है और इसी माध्यम से गाॅधी विचारों का प्रचार-प्रसार कर रहे हंै। अपने राज्य की कला और संस्कृति के विकास का कार्य भी कुछ लोगांे द्वारा किया जा रहा है। कलां मंच के माध्यम से नुक्कड़ नाटक तथा गीतों का आयोजन कर प्रचार-प्रसार का कार्य भी हो रहा है। सर्वोदय से जुड़े लोगों को भी योजना का लाभ दिया जा रहा है। अति वृद्ध गाँधीवादी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को अंतरिम राहत के रूप में स्काॅलरषिप दी जा रही है। 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे बच्चों का स्कूल संचालन ।
  • महिलाओं के बीच काम करने वाले साथियों को ।सुदूर ग्रामीण अंचलों में बंचित समुदाय को संगठित करना ।
  • स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देकर कला मण्डलियों का गठन करने वाले कलाकार साथियों को ।
  • अहिंसात्मक आन्दोलन में लगे साथियों को ।

9. लोक कला मंच

मानव जीवन विकास समिति ने अपने उद्धेष्यों की पूर्ति के लिए स्थानीय लोक कला तथा संस्कृति को अपना आधार बनाया है। गीतों, नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से गाॅव-गाॅव में चेतना जाग्रत करने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय बोली में परम्परागत गीत तथा नाटकों का आयोजन कर लोगों को संघर्ष के लिए गतिषील किया जाता है। आज तक प्रदेष के विभिन्न गाॅवों में 275 ग्राम मण्डलियों का गठन किया जा चुका है। गीतों तथा नाटकों को संस्था के उद्धेष्यों से जोड़कर तैयार किया जाता है। शांति एवं अहिंसात्मक संघर्ष में गीत और नुक्कड नाटक अहम भूमिका निभाते है। इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि गीत, नाटक स्थानीय बोली में हों ताकि आदिवासियों तथा अन्य जातियों के लोगांे को समझने में असानी हो।

10. महिला मंच

महिलाओं के विकास को दृष्टि में रखकर महिला सषक्तिकरण का कार्य किया जा रहा है। गँाव-गँाव में महिला मण्डल बनाकर उन्हंे आर्थिक रूप से सषक्त करने वाले कार्य समझाए जा रहे है जैसे- महिला स्व-सहायता समूह, बचत कोष, अन्न कोष आदि। षिक्षा के अभाव के कारण महिलाओं को शासन की नीतियों तथा योजनाओं का पूरा ज्ञान नहीं हैं। 2009-10 मेेें होने वाले पंचायती चुनाव में महिलाओं को 50 प्रतिषत आरक्षण प्राप्त था। पंचायत चुनाव के अवसर पर कार्यक्षेत्र के 07 ब्लाकों के अन्तर्गत आने वाले गँावों में 07 महिला प्रषिक्षण षिविर लगाए गए तथा चुनाव प्रक्रिया समझाने के साथ-साथ आपसी सहमति से निर्विरोध चुनाव पर विषेष जोर दिया गया जिसके परिणाम स्वरूप भादावर पंचायत के तीन गँावों में महिला सरपंच तथा 10 पंचों का निर्विरोध चुनाव हुआ। जिस प्रकार एक महिला घर को स्वर्ग या नर्क बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं उसी प्रकार समाज में यदि वह आगे आकर कार्य करे तो समाज का विकास हो सकता हैं। महिला मंच के माध्यम से महिलाओं को सषक्त किया जा रहा हैं जिसके परिणाम संतोषजनक हैं। गांव-गांव मे गाँधी विचार का फैलाव हो तथा लोग संगठित होकर अपनी समस्या समाधान की ओर जागृत होकर, खुद तैयार होकर शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले सकें तथा एक स्वच्छ समान निर्माण मे अपनी अहम भूमिका निभाएं इस हेतु नव जवान साथियों को प्रेरित करने के लिए समिति के अध्यक्ष श्री राजगोपाल पी0व्ही0 जी द्वारा युवा षिविरों का आयोजन किया जाता है।

11. पंचायत महिला सशक्तिकरण सम्मेलन

पंचायतराज महिला सषक्तीकरण की कार्यक्रम समन्वयक शोभा तिवारी प्रचायत चुनाव में चुनी गई महिला पंचों, सरपंचों को जो कटनी एवं डिण्डौरी जिले की 30 पंचायतों से हैं उनको प्रषिक्षण देने का कार्य कर रही हैं जिसके परिणाम स्वरूप महिलाओं के आत्म विष्वास में वृद्धि हुई है। पूरे देष के सरपंचों की दिल्ली में गोष्ठी आयोजित की गई है जिसमें बड़वारा ब्लाक की नन्हवारा पंचायत की तुलसा बाई भी सम्मिलित हो रही हैं। 

12. ग्रामीण मुखिया प्रषिक्षण

सामुदायिक विकास के लिए 2008-09 में बुंदेलखण्ड के 8 जिलोें के 110 लोगों को मुखिया प्रषिक्षण दिया गया। प्रषिक्षण देने का कार्य अध्यक्ष राजगोपाल पी0व्ही0 ने किया। उन्हांेने कहा कि गांधीवादी सिद्वान्तों पर चलकर आजीविका के साधन जल, जंगल और जमीन पर मालिकाना अधिकार प्राप्त करने के लिए भयमुक्त होना आवष्यक है। संस्था ने कार्यक्षेत्र के गँावों में अपने कार्य की शुरूआत मुखिया प्रषिक्षण से ही की थी। गँाव-गँाव में लोगों से सम्पर्क कर सामुदायिक विकास के लिए प्रषिक्षण षिविर लगाए गए। लोगों को संगठित कर समूह बनाये गए और कार्य करने के लिए पे्ररित किया गया क्यांेकि तभी भूखमुक्त समाज का गठन हो सकेगा। कटनी, डिण्डौरी, मण्डला एवं बालाघाट जिलों में 2000 से 2010 तक कुल 16 मुखिया प्रषिक्षणों का आयोजन किया गया।

13. स्वास्थ्य प्रबन्धन

क्षेत्र के लोंगो को स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से संस्था ने 2 वैद्यों की व्यवस्था की है जो गाँव-गाँव घूमकर प्रतिदिन लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएॅ निःषुल्क उपलब्ध करवाते हैं। उपचार के लिए जड़ी बूटियों का उपयोग किया जाता है। कई असाध्य रोग भी उनके उपचार से ठीक हो गये हंै। क्षेत्र में श्वास तथा पेट सम्बन्धी षिकायतें अधिक है। षिक्षा के अभाव के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतना का क्षेत्र में अभाव है। स्वास्थ्य प्रबन्धन कार्यक्रम के अन्तर्गत केवल मनुष्यों के स्वास्थ्य का ही नहीं वरन पषुओं के स्वास्थ्य की भी व्यवस्था की जाती है। गांव के लोग आज भी नहीं जानते कि पषु चिकित्सालय या पषुओं का डाॅक्टर भी होता है। फ्रांस से आए डाॅ0 रज्जाक ने क्षेत्र के गांवों के लोगों को संस्था के ट्रेनिंग सेंटर पर पषुओं के स्वास्थ्य के सम्बंध में प्रषिक्षण दिया। इसके बाद 10 लोंगों को चुनकर कटनी के पषु चिकित्सक से प्रषिक्षण दिलवाया। प्रषिक्षण के बाद इन लोगों ने क्षेत्र के गाॅवों में पषुओं की चिकित्सा का कार्य शुरू किया।

14. मादक पदार्थ विरोधी अभियान

महात्मा गाँधी के सपनों के भारत में मादक पदार्थो के लिए कोई स्थान नहीं था। प्रतिवर्ष अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह को नषामुक्ति के रूप में पूरे देष में मनाया जाता है। मानव जीवन विकास समिति ने गाँधी जी के जन्म दिन 2 अक्टूबर से 7 अक्टूबर 2004 तक पूरे सप्ताह को जागरूकता अभियान की तरह मनाया। कार्यक्रम के अन्तर्गत 69 गाँवों में ग्रामीण समूहों की बैठकें, पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़, सभाए की तथा ग्राम सभा की बैठक में प्रस्ताव लाकर महिलाओं से और शासकीय कर्मचारी से चर्चा कर आयोजन किये गये। अलग-अलग स्थानों पर कुल 2046 लोग सम्मिलित हुए। लगभग एक सौ लोंगो ने नषा छोड़ने के शपथ पत्र भरे। महिलाएं इस आयोजन से अधिक उत्साहित थीं क्योंकि परिवार में किया जा रहा नषा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। बुजुर्गो ने भी सहयोग दिया। 2004 के बाद संस्था प्रतिवर्ष अक्टूबर के प्रथम सप्ताह को गाँवों में नषामुक्ति अभियान की तरह मानती है जिसके कारण गाँवों में किये जा रहे नषे के औसत में कमी आई है। कटनी जिले के बड़वारा ब्लाक का जमुनिया गाँव संस्था के प्रयास से पूर्णतया नषामुक्त हो चुका है। नषे के आदी लोगों का पारम्परिक जड़ी बूटियों द्वारा उपचार कर उन्हें नषामुक्त करने का प्रयास किया जाता है।

15. स्वच्छता एवं कचरा प्रबन्धन

गाँधी जी के दैनिक कार्यक्रमों में सफाई अति आवष्यक कार्य था। उन्हीं आदर्षो का पालन करते हुए संस्था गाॅवों में एक दिवसीय षिविर का आयोजन कर सफाई प्रषिक्षण देने का कार्य करती है। कचरा तथा गोबर गड्ढ़ों में डलवाकर सफाई तथा खाद बनाने की प्रक्रिया समझाई जाती है। कचरे का प्रबन्धन आज विष्व के सभी देषों में एक बड़ी समस्या है। संस्था अपने क्षेत्र के सभी गाॅवों में प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक सफाई अभियान चलाती है।

  • संस्था अपने कार्यक्षेत्र के गाॅवों में अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में सफाई तथा कचरा प्रबन्धन प्रषिक्षण का आयोजन करती है। 
  • कचरे के प्रबन्धन के लिए लोगों को नाडेप पिट बनाकर उसमें कचरा डालने के लिए समझाया जाता है।
  • 2001-2002 में क्षेत्र के 11 गाॅवों में 50 नाडेप पिट बना लिए गए थे। 2003-2004 में 156 बना लिए।

16. ग्रामीण युवा क्षमता विकास

ग्रामीण युवाओं की क्षमताओं के विकास की आवष्यकता को ध्यान में रखकर 25 अप्रैल 2005 से 28 अप्रैल 2005 तक राजगोपाल पी0 व्ही0 के मार्गदर्षन में चार दिवसीय षिविर का आयोजन किया गया। प्रषिक्षण कार्यक्रम में विभिन्न जिलों के 153 युवाओं ने भाग लिया। गांव-गांव में गांधी विचार धारा का फैलाव हो तथा लोग संगठित होकर अपनी समस्या समाधान करें और जाग्रत होकर षासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले सकें तथा एक स्वस्थ समाज निर्माण में अपनी अहम भूमिका निर्वहन कर सकें। युवा शक्ति के विकास को ध्यान में रखकर गाॅवों में उनके समूह बनाकर संगठित किया गया है। प्रेरणा देकर रचनात्मक कार्यो का क्रियान्वयन उनसे करवाया जा रहा है। गांवों में आजीविका सम्बन्धी समस्यों का उचित समाधान न होने पर गांव के युवक शहरों का रूख करते है। पलायन को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य करने की उन्हें प्रेरणा दी जाती है। ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का उन्हें पूरा लाभ मिले इसका ध्यान रखा जाता है। सन्नई, चिरूहली, जमुनिया के क्षेत्र में रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत युवाओं को काम दिलवाकर एक लाख पचास हजार का भुगतान करवाया गया।

17. बाल कला एवं संस्कृति महोत्सव

17 जून से 22 जून 2005 तक बाल महोत्सव मनाया गया, जिसमें सतना, कटनी, भोपाल, उमरिया, रीवा से आए 77 बच्चों ने भाग लिया । राजगोपाल जी के मार्गदर्षन में 3 प्रषिक्षको मधु शर्मा, पीलाराम एवं कमलेष सिंह ने शारीरिक, मानसिक विकास के लिए नियमित दिनचर्या का महत्त्व समझाते हुए योगाभ्यास करवाया। इन कार्यो के महत्व को समझाने के लिए नुक्कड नाटक, गायन, प्रार्थना आदि का प्रयोग किया गया। मनोरंजन की दृष्टि से खेल, चुटकुले, कहानी को आधार बनाया गया। बच्चों के दल बनवाकर आपस में मनोरंजक स्पर्धाएँ भी की गयीं।ं ग्रामीण बच्चों ने अपने गँाव से दूर आकर अत्यन्त खुषी का अनुभव किया जो उनके मुस्कुराते उल्लासित चेहरों से दिखाई दे रही थी। बाल संस्कृति महोत्सव में बच्चों का उत्साह और उमंग देखकर संस्था ने अपने क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को जो गँाव के विकास कार्यो में लगे हुए हैं उन्हें अपने-अपने गँाव में 14 नवम्बर बाल दिवस के अवसर पर बाल महोत्सव का आयोजन ग्राम्य स्तर पर प्रतिवर्ष आयोजित करने के आदेष दिये। तब से प्रतिवर्ष बाल दिवस पर गँावों में बाल महोत्सव का अयोजन किया जाता है। 

18. वैकल्पिक षिक्षा प्रषिक्षण

वैकल्पिक षिक्षा के अन्तर्गत मैं कौन हूॅ ? तथा हम कौन हैं ? को समझने, समझाने का प्रयास किया जाता है। स्वयं को जानना आवष्यक हैं। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक क्षमता का गहराई से अध्ययन तथा पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म से लेकर शब्दों की ध्वनि से अक्षरों को कैसे बनाया गया ? शब्दों को जोडकर उनका अर्थ समझना तथा विभिन्न लिपियों का निर्माण कैसे हुआ आदि बातें समझाई जाती हैं। सकारात्मक सोच तथा कार्यक्षमता किस प्रकार विकसित की जा सकती है। वैकल्पिक षिक्षा देने का कार्य फ्रांस के प्रोफेसर लियो एलिसन एवं स्विटजरलैण्ड की अनीता हलधर द्वारा संस्था के कार्यक्षेत्रों में प्रषिक्षण षिविरोेें का आयोजन कर किया गया। उनका कहना है कि हमारे बच्चे हमसे अधिक समझदार कैसे हों इसके लिए निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिये। एक षिक्षक में बुद्धिमानी, षिष्टाचार, अच्छी समझ, उदारता एवं अच्छी विष्लेषण क्षमता होनी चाहिए तभी बच्चे अधिक समझदार और बुद्धिमान बनाये जा सकते हैं। संस्था द्वारा देष के उड़ीसा, उत्तरांचल एवं मध्यप्रदेष में स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। स्कूलों मे दिया जाने वाला ज्ञान-नई तालीम, तकनीकी जानकारी, योगा, प्रणायाम, पर्यावरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम, अक्षर ज्ञान, व्यवहार ज्ञान, समग्र ज्ञान, जय जगत का अभिवादन, सर्वधर्म प्रार्थना, राष्ट्रीय पर्वो पर उत्सव ।

19. स्थानीय कला

बांस, मिट्टी तथा लोहे की अन्य वस्तुओं से आकर्षक कलाकृति तथा दैनिक घरेलू उपयोगी सामान बनाने वाले कारीगरों को प्रोत्साहित करने के लिए तथा स्थानीय कला के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए समय-समय पर आयोजन कर प्रदर्षित किया जाता है। 

  • मण्डला जिले के रामतिल्ला गाँव के पनिका जाति के लोग बैगा आदिवासियों के लिए विषेष प्रकार का वस्त्र हथकरघे पर बुनकर बनाते है। 
  • मण्डला जिले के इमली टोला एवं सूरजपुरा गाँव के गोंड़ आदिवासी बांस से टोकरी, सूप, चावल रखने की विषेष टोकरी, पंखा, बांस का छाता, बांस हैट भी बनाते हंै तथा आकर्षक कला कृतियां, बेंत से बच्चों की कुर्सी, टेबल आदि बनाते हैं।
  • कुम्हार घड़ा, बर्तन सुराही के अतिरिक्त गमले तथा आकर्षक दीप फूलदान गमले आदि बनाते हैं।

20. पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से कार्य क्षेत्र के गाँवों में चेतना जाग्रत करने का कार्य किया जाता है। प्रतिवर्ष पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण करवाया जाता है। 2000 में 1200 आंवले तथा 1500 बांस के पौधे लगवाए गए। 2001 से 2002 के मध्य क्षेत्र के 10 गाँवों में 9300 पौधे लगाए गए तथा 2003 से 2004 के मध्य 20 गाँवों में 33,500 पौधे लगाये गये।कई प्रकार के पेड़ पौधे केन्द्र में उपलब्ध हंै प्राकृतिक रूप से तैयार हुए पौधों के संरक्षण व संवर्धन की दिषा मंे कार्य किया गया है। समिति का यह मानना है कि प्राकृतिक रूप से तैयार पौधे ही मजबूत व टिकाऊ होते हैं तथा उनसे ही स्थानीय बीज को बढ़ावा दिया जा सकता है।

21. वन अधिकार अधिनियम

वन अधिकार अधिनियम कानून के क्रियान्वयन के लिए लोगों से दावा प्रपत्र भरवाए गए जिसके अन्तर्गत 110 लोगांे को भूमि के पट्टे प्राप्त हुए हैं। कार्यक्षेत्र के गांवों में 5603 आवेदन जमा किये गये हैं जिनके लिये संस्था के कार्यकर्ता प्रयास कर रहे हैं।